रे मन

भाग रहा मन इधर उधर, मालूम नही कहा है डगर,प्यार पाना है या अकेलेपन , दूर होते जा रहा सबसे मन। कोई देख ले उसे और थाम ले बाहों मै तो शायद रुक जाए मन, कहा जान रहा मन ,कहा जान रहा, अपने से ही भाग रहा मन।। थक गया खुश करते करते सबको, खुद ही हंसना भूल गया।। फूल बन फैलाई खुशबू ,पर खुद की  ही खुशबू  भूल गया। ओरो को प्यार करने के चक्कर मै,अपने ही प्यार को भूल गया,फिर भी कह रहा मन कुछ तो होगा,कही तो होगा मेरे जैसा मेरा मन,।।  ,भटक रहा मृग तृष्णा मै दुनियां के भुलावे मैं, पता नहीं उसको, उसमे फस रहा सब  कोई।।रोक लो उसे,थाम लो उसे प्यार और सम्मान की डोर से,ताकि  दूर न हो सके तुम्हारा अपना मन।।

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